गाय में होने वाले रोग

गाय में होने वाले रोग

Hindi • April 26, 2022

👤 By: Animalsss
📅 Apr 26, 2022
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📌 Quick Summary

गाय के प्रमुख संक्रामक और सामान्य रोग — पहचान, रोकथाम और सही देखभाल।

⚕ ज़रूरी सूचना: यह लेख सिर्फ़ आम जानकारी के लिए है। किसी भी बीमारी के लक्षण दिखते ही सबसे पहले अपने नज़दीकी पशु चिकित्सक (वेटरनरी डॉक्टर) या पशुधन सहायक से संपर्क करें। नीचे बताए गए घरेलू या देसी नुस्खे पशु चिकित्सक की सलाह के बिना खुद न आज़माएँ — ग़लत इलाज या दवा की ग़लत मात्रा पशु के लिए जानलेवा हो सकती है।

इस लेख में — सीधे उस रोग पर जाएँ

संक्रामक रोगों में कुछ रोग ऐसे होते हैं। जिनका कोई उपचार नहीं होता है। ऐसी स्थिति में उपचार से बचाव  ही अच्छा और  उचित रास्ता होता हैं। संक्रामक रोगों से पीड़ित पशु की चिकित्सा भी अत्यंत मंहगी होती है। उपचार के लिए पशु की चिकित्सक भी गाँव में आसानी से नहीं मिल पाती है। इन रोगों से पीड़ित पशु को यदि उपचार कराने से  जीवित बच भी जाते हैं। तो भी उनके उस ब्यात के दूध की मात्रा में अत्यंत कमी हो जाती है। जिससे पशुपालकों को अधिक आर्थिक हानि होती है। संक्रामक रोगों के रोकथाम के लिए आवश्यक है। कि पशुओं में रोग रोधक टीके निर्धारित समय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष लगवाए जाएँ। तभी इन बीमारियों पे नियंत्रण पाया जा सकता है।

संक्रामक रोग (छूत की बीमारियाँ)

संक्रामक रोग – छूत की बीमारी एक मवेशी से अनेक मवेशियों में फ़ैल जाती  हैं। किसानों को इस बात का अनुभव है कि ये छूत की बीमारी आमतौर पर महामारी का रूप ले लेती है। संक्रामक रोग प्राय: विषाणुओं द्वारा फैलाये जाते हैं। लेकिन अलग – अलग रोग में इनके प्रसार के रास्ते अलग – अलग होते हैं। उदहारणत: खुरहा रोग के विषाणु बीमार पशु की लार से गिरते रहते हैं। तथा गौत पानी में घुस कर उसे दूषित बना देते हैं। इस गौत पानी के जरिए अनेक पशु इसके शिकार हो जाते हैं। अन्य संक्रामक रोग के जीवाणु भी गौत पानी मृत के चमड़े या छींक से गिरने वाले पानी के द्वारा एक पशु से अनेक पशुओं को रोग ग्रस्त बनाते हैं। इसलिए यदि गांव या पड़ोस के गाँव में कोई संक्रामक रोग फ़ैल जाए तो मवेशियों के बचाव के लिए निम्नाकिंत उपाय कारगर होते हैं –

  •  सबसे पहले रोग के फैलने की सूचना अपने पशुधन सहायक या ब्लॉक (प्रखंड) के पशुपालन पदाधिकारी को देनी चाहिए। वे इसके रोकथाम का इंतजाम तुरंत करते हुए बचाव के उपय भी बता सकते हैं। 
  • अगर पड़ोस के गाँव में बीमारी फैली हो तो उस गाँव से मवेशियों या पशुपालकों का आना जाना बंद कर देना चाहिए।
  • सार्वजनिक तालाब या आहार में मवेशियों को पानी पिलाना बंद कर देना चाहिए।
  •  इस रोग के पशुओं को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए।
  •  संक्रामक रोग से मरे हुए पशुओं को यहां – वहां नहीं फेकना चाहिए। ऐसे मृत पशुओं को जला देना चाहिए। या 5-6 फुट गड्ढा खोद कर चूना के साथ गाड़ (विधिपूर्वक) देना चाहिए। 
  •  जिस स्थान पर बीमार पशु को रखा गया हो या मरा हो उस स्थान को फिनाइल के घोल से अच्छी तरह धो देना चाहिए। या साफ- सुथरा वहाँ चूना छिड़क देना चाहिए। ताकि रोग के जीवाणु या विषाणु मर जाएँ
पंजाब में देसी गायों का झुंड
पंजाब के खेतों में चरता देसी गायों का झुंड। छूत की बीमारियाँ झुंड में तेज़ी से फैलती हैं — इसीलिए बीमार पशु को तुरंत बाकी पशुओं से अलग कर देना चाहिए।

पशुओं के प्रमुख रोग - रोकथाम एवं उपचार

1. खुरपका - मुहंपका रोग (फुट एंड माउथ डिजीज)

2. गलघोंटू (एच. एस)

3. गिल्टी रोग (एंथ्रेक्स)

4. लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर)

5. रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग)

6. चेचक या माता

7.  पशु – यक्ष्मा (टी. बी.)

8. थनैल

1. खुरपका - मुहंपका रोग (फुट एंड माउथ डिजीज)

यह एक विषाणुओं से फैलने वाला संक्रामक रोग है। जो कि सभी जुगाली करने वाले पशुओं में होता है। यह रोग गाय, भैंस, भेंड, बकरी, सुअर आदि पशुओं को पूरे वर्ष कभी भी हो सकता है। संकर गायों में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। इस रोग से पीड़ित पशु के पैर से खुर तक तथा मुंह में छालों का होना, पशु का लंगडाना व मुहं से लगातार लार टपकाना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण होते हैं। यह एक प्राणघातक रोग भी है। रोगी पशु की सामायिक चिकित्सा न करने से उसकी मृत्यु  भी हो सकती है। इस रोग से बचाव के लिए प्रत्येक छ: माह के अन्तराल पर पशु का टीकाकरण करवाना चाहिए तथा पशु में रोग फैलने की स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

2. गलघोंटू (एच. एस)

यह बीमारी गाय – भैंस को ज्यादा परेशान करती है। भेड़ तथा सुअरों को भी यह बीमारी लग जाती है। इसका प्रकोप ज्यादातर बरसात में होता है।

लक्षण – शरीर का तापमान बढ़ जाता है। और पशु सुस्त हो जाता है। रोगी पशु का गला सूज जाता है। जिससे खाना निगलने में कठिनाई होती है। इसलिए पशु खाना – पीना छोड़ देता है।  पशु को साँस लेने में भी काफ़ी तकलीफ होती है। किसी - किसी पशु को कब्ज़ की भी परेशानी हो जाती हैं। और उसके बाद दस्त भी होने लगते है। बीमार पशु 6 से 24 घंटे के भीतर मर जाता है। पशु के मुंह से लार गिरती है।

चिकित्सा – संक्रामक रोग से बचाव  और उनकी रोग – थाम के सभी तरीके अपनाना आवश्यक है। और रोगी पशु का तुरंत इलाज कराएं। बरसात के पहले ही निरोधक का टिका लगवा कर मवेशी को सुरक्षित कर लेना लाभदायक है। इसके मुफ्त टीकाकरण की व्यवस्था विभाग द्वारा की गई है।

3. गिल्टी रोग (एंथ्रेक्स)

यह एक बहुत ही भयंकर जीवाणुओं से फैलने वाला रोग है। गांवों में इस घातक रोग को गिल्टी रोग के अतिरिक्त जहरी बुखार, प्लीहा बुखार. बाघी आदि नामों से भी जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे एंथ्रेक्स कहते है। यह बैसिलस एंथ्रेक्स नाम जीवाणु से फैलता है। यह बीमारी गाय – भैंस, भेड़ बकरी, घोड़ा आदि में होती है। स्वस्थ पशुओं में यह रोग रोगी पशु के दाने – चारे बाल - ऊन, चमड़ा, श्वांस तथा घाव के माध्यम से फैलता है।

इस रोग में पशु के जीवित बचने की संभावना बहुत कम रहती है। यह रोग गाय भैंस के अलावा बैलों में भी फैलता है। इस रोग के जीवाणु चारे – पानी तथा घाव के रास्ते पशु के शरीर में प्रवेश करते है। और शीघ्र ही खून (रक्त) के अंदर फैलता है। और रक्त को दूषित कर देता हैं। उक्त के नष्ट होने पर पशु मर जाता है। रोग के जीवाणु पशु के पेशाब, गोबर तथा रक्तस्राव के साथ शरीर से बाहर निकलकर खाने वाले चारे को दूषित कर देते है। जिससे अन्य स्वस्थ पशुओं में भी यह रोग लग जाता है। अत: इन रोगी पशुओं को गांव के बाहर खेत में रखना चाहिए। रोग का गंभीर रूप आने पर पशु के मुहं, नक्, कान, गुदा तथा योनि से खून बहना प्रारंभ हो जाता है। रोगी पशु कराहता है। व पैर पटकता है। बीमारी की इस स्थिति में आने पर पशु मर सकता है। यह ध्यान रहे कि  रोगी पशु को बीमार होने पर कभी भी टीका नहीं लगवाना चाहिए।

4. लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर)

इस बीमारी को अलग – अलग क्षेत्र में लंगड़ी, सुजका, जहरवाद आदि नामों से भी जाना जाता है। यह गाय एवं भैंस की छूत की बीमारी है। यह बीमारी बरसात में अधिकतर फैलती है। स्वस्थ पशु में यह बीमारी रोगी पशु के चारे – दाने या पशु के घाव द्वारा फैलती है।

पशु में अचानक तेज बुखार आना. पैरों में लंगड़ाहट उसमें सूजन आना, भूख न लगना, कब्ज होना, खाल के नीचे कहीं – कहीं चर - की आवाज होना तथा दूध का फटना आदि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण है। इस  से बचाव के लिए वैक्सीन के टीके प्रतिवर्ष लगवाना चाहिए। बछड़े तथा बछियों को छ: माह की आयु में वर्षा ऋतु से पूर्व ही टीका लगवा देना चाहिए। यह टीका 3 वर्ष की आयु तक ही लगाया जाता है। रोग के लक्षण प्रकट होते ही पशु चिकित्सक की सहायता ली जानी चाहिए।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

गुजरात के फार्म में देसी बैल
गुजरात के एक फार्म में देसी बैल। पशु का अचानक सुस्त पड़ जाना और चारा-पानी छोड़ देना किसी बीमारी का पहला संकेत हो सकता है।

5. रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग)

यह बीमारी पोकानी, पकावेदन, पाकनीमानता, वेदन आदि नामों से गांव में जानी जाती है। यह रोग सभी जुगाली करने वाले पशुओं में होता है। इस रोग में तेज बुखार, भूख न लगना, दुग्ध उत्पादन में कमी होना, जीभ के नीचे तथा मसूड़ों पर छालों का पड़ना आदि प्रमुख लक्षण होते है। इस रोग में पशु की आंखे लाल हो जाती है। तथा उनमें गाढ़े – पीले रंग का कीचड़ बहने लगता है। खून से मिले पतले दस्त तथा कभी – कभी नाक तथा योनि द्वार पर छाले भी पड़ जाते हैं। रिंडरपेस्ट एक प्रकार का विषाणुजनित (वायरस) रोग है। यदि किसी पशु में इस रोग के लक्षण दिखाई देते है। तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं का सामयिक टीकाकरण कराना अति आवश्यक होता है।

ध्यान दें: रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग) अब दुनिया से पूरी तरह ख़त्म हो चुका है — 2011 में इसे वैश्विक रूप से समाप्त घोषित किया गया, और चेचक (स्मॉलपॉक्स) के बाद यह दुनिया का पहला पशु-रोग है जिसका पूर्ण उन्मूलन हुआ। भारत में यह 1990 के दशक के बाद नहीं देखा गया। ऊपर दी गई जानकारी ऐतिहासिक और शैक्षिक संदर्भ के लिए है; आज इसका ख़तरा नहीं है।

6. चेचक या माता

यह भी विषाणुओं से फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। जो आमतौर से गायों तथा उसकी संतान में होता है। कभी – कभी गायों के साथ – साथ भैंसों में भी यह रोग देखा गया है। इस रोग में पशु की मृत्यु दर तो कम होती है। परंतु पशु की कार्यक्षमता एवं दुग्ध उत्पादन में अत्यधिक कमी आती है। यह रोग भी आमतौर से एक पशु से दुसरे पशु को लगता है। दूध दूहने वाले ग्वालों द्वारा भी यह रोग एक गाँव से दुसरे गाँव में फैलता है। इस रोग से बचाव हेतु वर्ष में एक बार नवम्बर – दिसम्बर माह में टिका अवश्य लगवाना चाहिए।

7.  पशु – यक्ष्मा (टी. बी.)

मनुष्य के स्वस्थ्य के रक्षा के लिए भी इस रोग से काफी सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि यह रोग पशुओं का संसर्ग में रहने वाले या दूध इस्तेमाल करने वाले मनुष्य को भी अपने चपेट में ले सकता है।

लक्षण  - पशु कमजोर और सुस्त हो जाता है। कभी – कभी नाक से खून निकलता है। सूखी खाँसी भी हो सकती है। खाने के रुचि कम हो जाती है। तथा उसके फेफड़ों में सूजन हो जाती है।

चिकित्सा – संक्रामक रोगों से बचाव का प्रबंध करना चाहिए। संदेह होने पर पशु जाँच कराने के बाद

एकदम अलग रखने का इंतजाम करें। बीमार मवेशी को यथाशीघ्र गो – सदन में भेज देना ही उचित है। क्योंकी यह एक असाध्य रोग है।

8. थनैल

दुधारू मवेशियों को यह रोग दो कारणों से होता है। पहला कारण है थन पर चोट लगना या थन का काट जाना संक्रामक जीवाणु थन में प्रवेश कर जाते हैं। पशु को गंदे दलदली स्थान पर बांधने तथा दूहने वाले की असावधानी के कारण थन में जीवाणु प्रवेश क्र जाते हैं। अनियमित रूप से दूध दूहना भी थनैल रोग को निमंत्रण देना है। साधारणत: अधिक दूध देने वाली गाय – भैंस इसका शिकार बनती है।

लक्षण – थन गर्म और लाल हो जाना, उसमें सूजन होना, शरीर का तापमान बढ़ जाना, भूख न लगना, दूध का उत्पादन कम हो जाना, दूध का रंग बदल जाना तथा दूध में जमावट हो जाना इस रोग के खास लक्षण हैं।

चिकित्सा – पशु को हल्का और सुपाच्य आहार देना चाहिए। सूजे स्थान को सेंकना चाहिए। पशूचिकित्सक की राय से एंटीवायोटिक दवा या मलहम का इस्तेमाल करना चाहिए। थनैल से आक्रांत मवेशी को सबसे अंत में दुहना चाहिए।

9. लंपी स्किन डिजीज (LSD) — गाँठदार त्वचा रोग

यह रोग ऊपर दी गई पुरानी सरकारी सूची में नहीं था, लेकिन 2022 के बाद यह भारत में गाय-भैंस का सबसे चर्चित और तेज़ी से फैलने वाला रोग बन गया — इसलिए इसे यहाँ जोड़ना ज़रूरी है। लंपी स्किन डिजीज एक विषाणु (कैप्रिपॉक्स वायरस) से होने वाला रोग है। यह मुख्य रूप से मच्छर, काटने वाली मक्खियों और चिचड़ी (टिक) के काटने से एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है — यानी सीधे छूने से कम, और खून चूसने वाले कीड़ों से ज़्यादा। इसीलिए बरसात और उसके बाद के महीनों में, जब मच्छर-मक्खी सबसे ज़्यादा होते हैं, इसका प्रकोप बढ़ता है।

पहचान (लक्षण) — पहले तेज़ बुखार आता है, फिर पूरे शरीर की खाल पर 2–5 सेमी की सख़्त गाँठें (गिल्टियाँ) उभर आती हैं — ख़ासकर सिर, गर्दन, थन और पैरों पर। साथ में आँख-नाक से पानी बहना, मुँह से लार, भूख कम होना, गिल्टी-ग्रंथियों (लिम्फ नोड) का सूजना और दूध में तेज़ गिरावट दिखती है। गाँठें बाद में फूटकर घाव बन सकती हैं, जिनमें कीड़े पड़ सकते हैं। ज़्यादातर पशु ठीक हो जाते हैं (मृत्यु दर आमतौर पर कम रहती है), पर दूध और ताक़त की हानि लंबे समय तक चलती है।

बचाव और इलाज — इसका कोई सीधा वायरस-नाशक इलाज नहीं है; इलाज मुख्यतः सहायक होता है — घावों की सफ़ाई, कीड़े पड़ने से रोकना, और बुखार, दर्द व दूसरे जीवाणु-संक्रमण के लिए पशु चिकित्सक की दवा। असली बचाव तीन बातों में है: (1) बीमार पशु को झुंड से तुरंत अलग करना, (2) मच्छर-मक्खी-टिक पर काबू (साफ़-सफ़ाई, पानी जमा न होने देना, दवा-छिड़काव), और (3) टीकाकरण। भारत में इस पर काबू के लिए बकरी-चेचक (Goat Pox) का टीका बड़े पैमाने पर लगाया गया, और सरकार व ICAR ने LSD का स्वदेशी टीका भी तैयार किया है। अपने क्षेत्र के पशुधन विभाग से टीके की मौजूदा व्यवस्था ज़रूर पूछें।

पंजाब की डेयरी में साहीवाल दुधारू गाय
पंजाब की एक डेयरी में साहीवाल दुधारू गाय। थनैल जैसे रोग दुधारू पशुओं में आम हैं; थन की सफ़ाई और सही तरीके से दुहाई इनसे बचाव में मदद करती है।

गायों में होने वाले सामान्य रोग

संक्रामक रोगों के अलावा बहुत सारे साधारण रोग भी हैं जो पशुओं की उत्पादन – क्षमता कम कर देते है। ये रोग ज्यादा भयानक नहीं होते, लेकिन समय पर इलाज नहीं कराने पर काफी खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। सामान्य बीमारियों के लक्षण और प्राथमिक चिकित्सा। 

1. अफरा

हरा और रसीला चारा, भींगा चारा या दलहनी चारा अधिक मात्रा में खा लेने के कारण पशु को अफरा की बीमारी हो जाती है। खासकर, रसदार चारा जल्दी – जल्दी खाकर अधिक मात्रा में पीने से यह बीमारी पैदा होती है। बाछा – बाछी को ज्यादा दूध पी लेने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। पाचन शक्ति कमजोर हो जाने पर मवेशी को इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है।

लक्षण

  • इस रोग में पशुओं का पेट फूल जाता है। ज्यादातर रोगी पशु का बायाँ पेट पहले फूलता है। पेट को थपथपाने पर ढोल की तरह (ढप – ढप) की आवाज निकलती है। पशु कराहने लगता है।
  • पशु को साँस लेने में तकलीफ होती है।
  • रोग बढ़ जाने पर पशु चारा और दाना खाना छोड़ देता है। और बेचैनी बढ़ जाती है।
  • रोग के अत्यधिक तीव्र अवस्था में पशु बार-बार लेटता और खड़ा होता है।
  • पशु कभी – कभी जीभ बाहर लटकाकर हांफता हुआ नजर आता है। और पीछे के पैरों को बार-बार पटकता है।

चिकित्सा

  • पशु के बाएं पेट पर दबाव डालकर मालिश करनी चाहिए।
  • पशु के ऊपर ठंडा पानी डालें और तारपीन का तेल पकाकर लगाएँ।
  • मुहं को खुला रखने का इंतजाम करें। इसके लिए जीभी को मुंह से बाहर निकालकर जबड़ों के बीज कोई साफ और चिकनी लकड़ी रखें ।
  • रोग की प्रारंभिक अवस्था में पशु को इधर – उधर घुमाने से भी फायदा होता है।
  • पशु को पशुचिकित्सक से परामर्श लेकर तारपीन का तेल आधा से एक छटाक, छ: छटाक टीसी के तेल में मिलाकर पिलाया जा सकता है। उसके बाद दो सौ ग्राम मैगसल्फ़ और दो सौ ग्राम नमक एक बड़ी बोतल में पानी में मिलाकर जुलाब देना चाहिए।
  • पशु को लकड़ी के कोयले का चूरा, आम का पुराना आचार, काला नमक, अदरख, हिंग और सरसों जैसी चीज पशुचिकित्सक के परामर्श से खिलायी जा सकती है।
  • पशु को स्वस्थ होने पर थोड़ा – थोड़ा पानी दिया जा सकता है। लेकिन किसी प्रकार का चारा नहीं खिलाया जा सकता है।

2. दुग्ध - ज्वर

दुधारू गाय भैंस या बकरी इस रोग के चपेट में पड़ती है। ज्यादा दुधारू पशु को ही यह बीमारी अपना शिकार बनाती है। बच्चा देने के 24 घंटे के अदंर दुग्ध – ज्वर के लक्षण साधारणतया दिखेते हैं।

लक्षण

  • पशु बेचैन हो जाता है। पशु कांपने और लड़खड़ाने लगता है। मांसपेसियों में कंपन होने लगती हैं। जिसके कारण पशु खड़ा रहने में असमर्थ रहता है।
  • मुंह सूख जाता है। पलके झूकी – झूकी और आंखे निस्तेज सी दिखाई देती है।
  • पशु सीने के सहारे जमीन पर बैठता है। गर्दन और शरीर को एक ओर मोड़ लेता है। ज्यादातर पीड़ित पशु इसी अवस्था में देखे जाते हैं।
  • तीव्र अवस्था में पशु बेहोश हो जाता है और गिर जाता है। चिकित्सा नहीं करने पर कोई- कोई पशु 24 घंटे के अंदर मर भी जाता है।

चिकित्सा

  • थन को गीले कपड़े से पोंछ कर उसमें साफ कपड़ा इस प्रकार बांध दें कि उसमें मिट्टी न लगे।
  • ठीक होने के बाद 2-3 दिनों तक थन को पूरी तरह खाली नहीं करें।
  • पशु को जल्दी और आसानी से पचने वाली खुराक दें।
स्वस्थ गाय
स्वस्थ पशु की नियमित देखभाल और समय पर टीकाकरण ही ज़्यादातर रोगों से बचाव का सबसे भरोसेमंद तरीका है।

3. दस्त और मरोड़

इस रोग के दो कारण हैं – अचानक ठंडा लग जाना और पेट में किटाणुओं का होना। इसमें आंत में सुजन हो जाती है।

लक्षण

  • पशु को पतले और पानी जैसे दस्त होते है।
  • पेट में मरोड़ होती है।
  • आंव के साथ खून गिरता है।

चिकित्सा

  • ऐसे में आसानी से पचने वाला आहार जैसे माड़, उबला हुआ दूध, बेल का गुदा आदि खिलाना चाहिए।
  • चारा पानी कम देना चाहिए।
  • बाछा – बाछी को कम दूध पीने देना चाहिए।

4. निमोनिया

पानी में लगातार भींगते रहने या सर्दी के मौसम में खुले स्थान में बांधे जाने वाले मवेशी को निमोनिया रोग हो जाता है। अधिक बाल वाले पशुओं को यदि धोने के बाद ठीक से पोछा न जाए तो उन्हें भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण

  • शरीर का तापमान बढ़ जाता है और सांस लेने में कठिनाई होती है।
  • नाक से पानी बहता है और भूख भी कम लगती है।
  • पैदावार घट जाती है और पशु भी कमजोर हो जाता है।

चिकित्सा

  • बीमार मवेशी को साफ तथा गर्म स्थान पर रखना चाहिए।
  • उबलते पानी में तारपीन का तेल डालकर उससे उठने वाला भाप पशुओं को सूँघाने से फायदा होता है।
  • पशु के पांजर में सरसों के तेल में कपूर मिलकर मालिश करनी चाहिए।

घाव

पशुओं को घाव हो जाना आम बात है। चरने के लिए बाड़ा और काँटों, झाड़ियों से काटकर अथवा किसी दुसरे प्रकार की चोट लग जाने से मवेशी को घाव हो जाता है। हल का फाल लग जाने से भी बैल को घाव हो जाता है। और किसानों की खेती – बारी चौपट हो जाती है। बैल के कंधों पर पालों की रगड़  से भी सूजन और घाव हो जाता है। 

चिकित्सा

  • सहने लायक गर्म पानी में लाल पोटाश या फिनाइल मिलाकर घाव की धुलाई करनी चाहिए।
  • अगर घाव में कीड़े हो तो तारपीन के तेल में भिंगोई हुई पट्टी बांध देनी चाहिए।
  • मुंह के घाव को, फिटकरी के पानी से धोकर छोआ और बोरिक एसिड का घोल लगाने से फायदा होता है।
  • शरीर के घाव पर नारियल के तेल में ¼ भाग तारपीन का तेल और थोड़ा सी कपूर मिलाकर लगाना चाहिए।

गाय-भैंस का टीकाकरण कैलेंडर (सामान्य)

ऊपर बताए ज़्यादातर जानलेवा संक्रामक रोगों से बचाव का सबसे भरोसेमंद और सस्ता तरीका समय पर टीका लगवाना है। नीचे भारत में आमतौर पर अपनाया जाने वाला शेड्यूल दिया है। यह सामान्य मार्गदर्शन है — सही समय आपके इलाके, मौसम और रोग की स्थिति पर निर्भर करता है, इसलिए अपने पशु चिकित्सक या पशुधन विभाग के बताए शेड्यूल का ही पालन करें।

रोग पहला टीका दोहराव (बूस्टर)
खुरपका-मुँहपका (FMD)4 माह की उम्र मेंहर 6 महीने में
गलघोंटू (HS)6 माह की उम्र मेंसाल में एक बार, मानसून से पहले
लंगड़िया (BQ)6 माह की उम्र मेंसाल में एक बार, मानसून से पहले
एंथ्रेक्स (गिल्टी)प्रभावित क्षेत्रों मेंसाल में एक बार
ब्रुसेलोसिससिर्फ़ मादा बछड़ी, 4–8 माह की उम्रजीवन में एक बार
लंपी स्किन डिजीज (LSD)जोखिम/प्रकोप क्षेत्र मेंविभाग की सलाह अनुसार

ज़रूरी बातें: टीका लगवाने से पहले पशु का कृमिनाशक (deworming) करा लें — इससे टीका बेहतर असर करता है। गाभिन या पहले से बीमार पशु को टीका सिर्फ़ पशु चिकित्सक की सलाह पर लगवाएँ। भारत सरकार के राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) के तहत खुरपका (FMD) और ब्रुसेलोसिस का टीका मुफ़्त लगाया जाता है — अपने नज़दीकी पशु अस्पताल से पूछें।

⚠ इन लक्षणों में देर न करें — तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ

  • पशु ने चारा-पानी पूरी तरह छोड़ दिया हो या 24 घंटे से जुगाली बंद हो
  • तेज़ बुखार के साथ मुँह से लगातार लार या साँस लेने में तकलीफ़
  • मुँह, नाक, गुदा या योनि से खून आना
  • अचानक लंगड़ाना, खड़ा न हो पाना, या पूरे शरीर में गाँठें उभरना
  • ब्याने के तुरंत बाद पशु का काँपना, गिर जाना या बेहोशी (दुग्ध ज्वर)
  • दूध का रंग/गाढ़ापन बदलना या थन का गर्म-लाल होकर सूजना (थनैल)

छूत की बीमारी की आशंका हो तो बीमार पशु को तुरंत बाकी झुंड से अलग कर दें और पशुधन सहायक/विभाग को सूचना दें।


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तस्वीरें (फ़ोटो साभार): गायों का झुंड — Sarbjit Bahga (CC BY-SA 4.0); बैल — RndmCrs (CC0); साहीवाल गाय — Harvinder Chandigarh (CC BY-SA 4.0); सफ़ेद गाय — Cgoodwin (CC BY-SA 4.0)। सभी तस्वीरें Wikimedia Commons से।
स्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार; टीकाकरण शेड्यूल — विकासपीडिया (Vikaspedia) एवं पशुपालन व डेयरी विभाग (DAHD / NADCP); लंपी स्किन डिजीज की जानकारी — Merck Veterinary Manual एवं सार्वजनिक पशु-स्वास्थ्य स्रोत।

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